प्रयागराज के पवित्र संगम तट पर चल रहे माघ मेले में कड़कड़ाती ठंड के बीच सियासी और धार्मिक तापमान अचानक चरम पर पहुँच गया है। ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उत्तर प्रदेश शासन के मेला प्रशासन के बीच टकराव ने ‘धर्म’ और ‘सत्ता’ को आमने-सामने खड़ा कर दिया है। यह विवाद अब केवल प्रशासनिक निर्णय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संत समाज की प्रतिष्ठा और धार्मिक अधिकारों का प्रश्न बन गया है।
क्या है पूरा मामला?
विवाद की शुरुआत मौनी अमावस्या (18 जनवरी) के शाही स्नान के दौरान हुई। आरोप है कि शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपनी पालकी और अनुयायियों के साथ संगम नोज़, यानी मुख्य स्नान स्थल तक जाना चाहते थे।
हालांकि, पुलिस और मेला प्रशासन ने भारी भीड़ और सुरक्षा का हवाला देते हुए उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया।
इसी दौरान संतों और पुलिस के बीच तीखी नोकझोंक हो गई। शंकराचार्य का आरोप है कि उनके शिष्यों के साथ अभद्रता की गई और संतों की गरिमा को ठेस पहुँचाई गई।
प्रशासन का ‘नोटिस बम’
मामला तब और गंभीर हो गया जब मेला प्रशासन ने शंकराचार्य को एक के बाद एक दो नोटिस जारी कर दिए।
पहला नोटिस:
प्रशासन ने आरोप लगाया कि शंकराचार्य समर्थकों ने बैरिकेडिंग तोड़कर प्रतिबंधित क्षेत्र में वाहन ले जाने का प्रयास किया, जिससे भगदड़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती थी।
दूसरा और सबसे विवादास्पद नोटिस:
प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट में लंबित एक पुराने मामले का हवाला देते हुए यह सवाल उठाया कि जब मामला विचाराधीन है, तो स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ‘शंकराचार्य’ की उपाधि का उपयोग किस आधार पर कर रहे हैं। इस नोटिस ने विवाद को पूरी तरह धार्मिक अस्मिता के मुद्दे में बदल दिया।
शंकराचार्य का तीखा पलटवार
प्रशासन की कार्रवाई से संत समाज में भारी आक्रोश फैल गया है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इसे “संतों का अपमान और धर्म में सत्ता का हस्तक्षेप” बताया। उन्होंने अन्न-जल त्याग कर अपने शिविर के बाहर धरना शुरू कर दिया और प्रशासन को मानहानि का मुकदमा दर्ज कराने की चेतावनी दी है।
शंकराचार्य का कहना है, “कोई डीएम या कमिश्नर यह तय नहीं कर सकता कि शंकराचार्य कौन है। यह धर्म का विषय है, सत्ता का नहीं। यह संत समाज को अपमानित करने की सोची-समझी साजिश है।”
संत समाज में रोष
माघ मेले में मौजूद कई अखाड़ों और संतों ने भी प्रशासन की कार्रवाई पर नाराज़गी जताई है। संतों का कहना है कि प्रयागराज और संगम जैसे तीर्थस्थलों पर धर्माचार्यों की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
राजनीतिक रंग
यह धार्मिक विवाद अब राजनीतिक गलियारों तक पहुँच चुका है।
समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने योगी सरकार पर “तानाशाही रवैये” का आरोप लगाते हुए शंकराचार्य के समर्थन में बयान दिए हैं।
वहीं, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बिना किसी का नाम लिए कहा है कि,
“एक संत और संन्यासी के लिए राष्ट्र और धर्म से बढ़कर कुछ नहीं होता। जो लोग सनातन की आड़ में समाज को कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं, उनसे सतर्क रहने की आवश्यकता है।”
तनाव बरकरार
फिलहाल संगम तट पर स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है।एक ओर प्रशासन नियम और सुरक्षा का हवाला देकर अपने फैसलों पर अडिग है, तो दूसरी ओर शंकराचार्य इसे अपनी धार्मिक प्रतिष्ठा और संत समाज के सम्मान की लड़ाई बता रहे हैं। अब सभी की निगाहें इस पर टिकी हैं कि माघ मेला समाप्त होने से पहले यह ‘धर्म बनाम सत्ता’ का टकराव किस मोड़ पर पहुँचता है।