प्रयागराज। माघ मेले के दौरान ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े विवाद पर योग गुरु बाबा रामदेव का बड़ा बयान सामने आया है। संगम स्नान के लिए प्रयागराज पहुंचे बाबा रामदेव ने जहां एक ओर संतों के सम्मान पर जोर दिया, वहीं दूसरी ओर समाज को आपसी टकराव से बचने की नसीहत भी दी।
गुरुवार को संगम घाट पहुंचे बाबा रामदेव ने विधिवत स्नान और आरती में भाग लिया। इसके बाद उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा कि संतों और योगियों के साथ किसी भी प्रकार का अपमानजनक व्यवहार न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि सनातन परंपरा के मूल भाव के भी विरुद्ध है।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि शंकराचार्य जैसे पूजनीय पद पर आसीन संतों के प्रति असम्मान स्वीकार नहीं किया जा सकता। बाबा रामदेव ने कहा कि किसी भी साधु के लिए अपशब्दों या तिरस्कार का प्रयोग निंदनीय है और समाज को इस पर गंभीर आत्ममंथन करना चाहिए।
‘देश को तोड़ने वाले एजेंडे बाहर बहुत हैं’
बाबा रामदेव ने अपने बयान में कहा कि आज देश के बाहर और भीतर कई तरह के एजेंडे सक्रिय हैं। कोई इस्लामीकरण की बात करता है, कोई ईसाईकरण की, तो कोई गजवा-ए-हिंद जैसे विचार फैलाने में लगा है। ऐसे समय में सनातन परंपरा के अनुयायियों को आपस में संघर्ष से बचना चाहिए।
उन्होंने कहा कि साधु का अर्थ ही अहंकार से मुक्त होना है। तीर्थ स्थलों पर विवाद, प्रदर्शन या शक्ति प्रदर्शन की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। माघ मेला नाम, जप और तप का पर्व है, न कि प्रतिष्ठा या प्रभुत्व दिखाने का मंच।
‘तीर्थ किसी के व्यक्तिगत एजेंडे के लिए नहीं’
योग गुरु ने कहा कि तीर्थ स्थलों को किसी के व्यक्तिगत अहम या राजनीतिक-सामाजिक एजेंडे से दूर रखा जाना चाहिए। संगम तीन पवित्र नदियों का मिलन स्थल है, जो मुक्ति और साधना का प्रतीक है। यहां आने वाला हर व्यक्ति संयम और मर्यादा के साथ व्यवहार करे, यही सनातन की आत्मा है।
संगम स्नान को बताया सौभाग्य
अपने अनुभव साझा करते हुए बाबा रामदेव ने कहा कि त्रिवेणी संगम में स्नान और दान का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। संगम तक पहुंचना ही अपने आप में एक बड़ा सौभाग्य है। उन्होंने माघ मेले की व्यवस्थाओं की सराहना करते हुए कहा कि जिस तरह से आयोजन को सुव्यवस्थित किया गया है, वह संत समाज और श्रद्धालुओं—दोनों के लिए संतोषजनक है।
क्या है पूरा विवाद
गौरतलब है कि माघ अमावस्या के दिन शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने शिष्यों के साथ रथ सहित संगम स्नान के लिए पहुंचे थे। इस दौरान पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से उन्हें बिना रथ आगे बढ़ने को कहा। इसी बात को लेकर शंकराचार्य के शिष्यों और प्रशासन के बीच तीखी बहस और झड़प हुई।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने इस घटना को अपने सम्मान से जोड़ते हुए इसे जानबूझकर किया गया व्यवहार बताया। घटना के बाद से वह माघ मेले के क्षेत्र में ही धरने पर बैठे हुए हैं और संत समाज में इस मुद्दे को लेकर लगातार चर्चा जारी है।
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