सनातन परंपरा से जुड़ा एक बड़ा घटनाक्रम सामने आ रहा है। ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर चल रहे विवाद के बीच ऐसा संकेत मिल रहा है कि चारों पीठों के शंकराचार्य 19 साल बाद एक ही मंच पर दिखाई दे सकते हैं।
सूत्रों के मुताबिक 10 मार्च 2026 को दिल्ली में गो-रक्षा के मुद्दे पर एक विशाल आयोजन प्रस्तावित है।
यह कार्यक्रम “गो माता – राष्ट्र माता अभियान” के तहत आयोजित किया जाएगा, जहां चारों शंकराचार्यों की मौजूदगी की संभावना जताई जा रही है।
अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर सहमति के संकेत
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर पहले से ही दो पीठों का समर्थन सामने आ चुका है। अब यदि तीसरी पीठ की भी खुली सहमति मिलती है, तो वर्षों से चल रहा “असली-नकली शंकराचार्य” विवाद काफी हद तक शांत हो सकता है।
खास बात यह है कि पुरी पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद, जो अब तक अविमुक्तेश्वरानंद के नाम पर सार्वजनिक सहमति नहीं देते थे, उन्होंने माघ मेला क्षेत्र में दो दिन पहले उन्हें “अपना लाडला” कहकर संबोधित किया।
इस बयान को धार्मिक हलकों में बड़ा संकेत माना जा रहा है।
गो-रक्षा आंदोलन और शंकराचार्यों की भूमिका
गो-रक्षा आंदोलन को लेकर पुरी पीठ के शंकराचार्य निश्चलानंद पहले से ही सक्रिय आंदोलन में हैं। गाय की रक्षा के संकल्प के तहत उन्होंने सिंहासन और छत्र तक का त्याग कर रखा है।
यदि गो-रक्षा के मंच पर चारों शंकराचार्य एक साथ आते हैं, तो इसका सीधा अर्थ होगा —स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर सभी पीठों की सामूहिक सहमति। जानकारी के अनुसार, चारों पीठों के शंकराचार्यों को आमंत्रण भेजने की तैयारी की जा रही है।
इतिहास में तीसरी बार बन सकता है ऐसा संयोग
सनातन धर्म के इतिहास में ऐसा दृश्य बहुत दुर्लभ रहा है—
1779: पहला चतुष्पीठ सम्मेलन, श्रृंगेरी में
19 मई 2007: बेंगलुरु में रामसेतु आंदोलन को लेकर सम्मेलन
2026 (संभावित): दिल्ली में गो-रक्षा आंदोलन का मंच
यदि दिल्ली का आयोजन सफल होता है, तो यह धार्मिक इतिहास में तीसरी बार होगा जब चारों पीठों के शंकराचार्य एक मंच पर एक साथ दिखाई देंगे।
सनातन परंपरा के लिए ऐतिहासिक अवसर
धार्मिक जानकारों का मानना है कि यह आयोजन केवल गो-रक्षा आंदोलन तक सीमित नहीं रहेगा,
बल्कि सनातन परंपरा में एकता, नेतृत्व और वैचारिक स्पष्टता का नया अध्याय भी लिख सकता है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पहले भी गो-रक्षा को लेकर कई बार मुखर रहे हैं,
और अब यह संभावित मंच सनातन इतिहास का एक निर्णायक मोड़ बन सकता है।