नई दिल्ली में एक बयान ने एक बार फिर देश की राजनीति को गर्मा दिया है। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी द्वारा दिए गए बयान के बाद हिजाब, महिला अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। ओवैसी के बयान को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कई सवाल खड़े किए हैं।
ओवैसी के बयान से शुरू हुआ विवाद
असदुद्दीन ओवैसी ने हाल ही में कहा था कि आने वाले समय में एक हिजाब पहनने वाली महिला देश की प्रधानमंत्री बनेगी। उनके इस बयान को उन्होंने महिला सशक्तिकरण से जोड़कर पेश किया, लेकिन विपक्ष ने इसे राजनीतिक एजेंडे के तौर पर देखा।
BJP ने गिनाए अंतरराष्ट्रीय उदाहरण
ओवैसी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए बीजेपी सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि दुनिया के कई मुस्लिम-बहुल देशों में महिलाएं प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति रह चुकी हैं, लेकिन उनमें से किसी ने भी धार्मिक परिधान को सत्ता की पहचान नहीं बनाया। उन्होंने बांग्लादेश, पाकिस्तान और इंडोनेशिया का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां की महिला नेतृत्व ने आधुनिक और संवैधानिक मूल्यों के साथ शासन किया।
उन्होंने आगे कहा कि पैगंबर मुहम्मद के वंश से जुड़े कई शाही परिवारों की महिलाओं का उदाहरण भी यही दर्शाता है कि नेतृत्व और पहनावे को जोड़कर राजनीति करना उचित नहीं है।
बीजेपी का आरोप: मुद्दों से भटकाने की कोशिश
बीजेपी नेता गौरव वल्लभ ने भी ओवैसी पर निशाना साधते हुए कहा कि यह बयान मुस्लिम समाज के विकास से ज्यादा राजनीतिक ध्रुवीकरण की कोशिश है। उनका कहना था कि ओवैसी मुस्लिम महिलाओं के व्यापक सशक्तिकरण की बात नहीं करते, बल्कि एक विशेष पहचान को आगे रखकर भावनात्मक राजनीति करना चाहते हैं।
सियासत बनाम सशक्तिकरण
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या महिला सशक्तिकरण को धार्मिक पहचान से जोड़ना सही है। विशेषज्ञों का मानना है कि नेतृत्व का मूल्यांकन योग्यता, संवैधानिक सोच और प्रशासनिक क्षमता से होना चाहिए, न कि पहनावे या प्रतीकों से।
आगे क्या?
ओवैसी के बयान और बीजेपी की प्रतिक्रियाओं से यह साफ है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बना रहेगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि यह बहस महिलाओं के वास्तविक अधिकारों और अवसरों तक पहुंचती है या केवल बयानबाज़ी तक सीमित रह जाती है।