तंगहाली से जूझकर बने 'स्विंग के सुल्तान': पूर्व भारतीय दिग्गज जहीर खान की अनकही दास्तान

तंगहाली से जूझकर बने 'स्विंग के सुल्तान': पूर्व भारतीय दिग्गज जहीर खान की अनकही दास्तान

पैदल तय किया 4 किमी का सफर, तंगहाली से जूझकर बने 'स्विंग के सुल्तान': पूर्व भारतीय दिग्गज जहीर खान की अनकही दास्तान

नई दिल्ली: भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे घातक तेज गेंदबाजों में शुमार और रिवर्स स्विंग के जादूगर जहीर खान की सफलता की चमक के पीछे आंसुओं और कठोर संघर्ष की एक लंबी दास्तान छिपी है। हाल ही में चेन्नई सुपर किंग्स (CSK) के मेंटॉर/हेड कोच बनने की चर्चाओं के बीच पूर्व दिग्गज के शुरुआती दिनों के संघर्ष की कहानी एक बार फिर सुर्खियों में आ गई है।

महाराष्ट्र के श्रीरामपुर में एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे जहीर पढ़ाई में बेहद होनहार थे और 12वीं में 85% अंक हासिल कर उन्होंने इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला भी ले लिया था। मगर क्रिकेट के बेपनाह जुनून के आगे उन्होंने इंजीनियरिंग की डिग्री को अलविदा कह दिया और 1996 में अपने पिता के साथ मुंबई का रुख किया।

मुंबई में जहीर अपनी दादी के साथ एक छोटे से कमरे में रहते थे। आर्थिक तंगी का आलम यह था कि उनके पास ढंग के जूते और ट्रेनिंग किट तक नहीं थी। अभ्यास के लिए वे रोज 4 किलोमीटर पैदल चलकर जाते थे। उनके पिता हर 8-10 दिन में श्रीरामपुर से मुंबई आकर खाने-पीने के लिए पैसे देते थे। उस दौर में कोच सुधीर नाइक उनके जीवन में देवदूत बनकर आए, जिन्होंने उन्हें जूते दिलवाए और गुजारे के लिए क्लब में 5,000 रुपये महीने की नौकरी की व्यवस्था की।

मुंबई की घरेलू टीम में मौका न मिलने पर जहीर ने हार नहीं मानी और बड़ौदा (गुजरात) का रुख किया। 2000-01 रणजी फाइनल में 8 विकेट चटकाकर उन्होंने चयनकर्ताओं के दरवाजे तोड़ दिए और सीधे टीम इंडिया में एंट्री पाई। भारत के लिए 92 टेस्ट में 311 और 200 वनडे में 282 विकेट चटकाने वाले जहीर 2011 विश्व कप जीत के संयुक्त रूप से सबसे बड़े हीरो (21 विकेट) रहे। अर्जुन अवॉर्ड और पद्मश्री से सम्मानित यह गेंदबाज आज दुनिया भर के युवाओं के लिए मिसाल है।